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Saturday, 29 November 2025

खेल खत्म- अर्जुन राठौर

स्मैकिये लोगों की एक्शन कहानी
खेल खत्म- अर्जुन राठौर

वह एक फरार अपराधी था। शक्ल सूरत से सांवला, मासूम, निर्दोष लगने वाला अनिल गोस्वामी बेहद रहस्यमय, शातिर और श्याना था। बम्बई आकर स्मैकचियों की संगत में पड़कर डोप पैडलर बन गया और आखिरी बार वो ड्रग्स की बड़ी खेप लाया और माल का पता भी वह तरीके से नहीं बता पाया था कि कोई उसका बैंड बजा गया। और उस माल के पीछे कई जने पड़े हुए थे।

कभी-कभी इंसान के जीवन के ऐसा भी वक्त आता है जब वह अपने विचार, अपनी भावनाओं से परे होकर ऐसा खेल खेल जाता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । प्रस्तुत उपन्यास 'खेल खत्म' भी एक Ghost writer नाम जैसे असली लेखक की कलम से निकला एक्शन उपन्यास है।
  यह कहानी है जिस इंसान की है उसके विषय में आप उपन्यास के प्रथम पृष्ठ से पढ सकते हैं।

वह लोकल ट्रेन से अंधेरी स्टेशन पर उतरा। वह थके, निढाल कदमों से चलता हुआ स्टेशन से बाहर निकला।
वह एक लम्बा, कसरती बदन का मालिक, गोरा-चिट्टा खूबसूरत शख्स था। उसकी शक्ल देखकर विनोद खन्ना की याद ताजा हो आती थी।
वह अपने हालात से निराश, तकदीर से खफा, दुनिया की भीड़ में अपने आपको तन्हा महसूस करता हुआ शख्स था। अपनी हर्राफा बीवी के कलह-क्लेश, उसकी नफरत और जफा से हैरान, बेहद आन्दोलित, सकून तलाशता हुआ वह बम्बई भाग आया था।


       वह एक खूब पढ़ा-लिखा, सीधा-सादा, धर्मभीरु इंसान था।
तनाव और अवसाद से वह कभी रु-ब-रु नहीं हुआ था। लेकिन वाह रे तकदीर! शादी उसकी एक ऐसी फूहड़, वाचाल, कलह क्लेशी औरत से हो गयी थी कि उसे सुझाई नहीं पड़ा था कि ऐसे हालात से किस तरह सामना करे। अपनी बीवी से उसे घोर निराशा और ऐसी वितृष्णा हुई कि कई बार उसने आत्मघाती कदम उठाने का ख्याल किया। लेकिन मानव जिन्दगी का ये कायरतापूर्ण अंजाम उसे रास न आया। उसने अपनी बीवी के साथ दो साल गुजारे । जैसे-तैसे उसने अपनी जिन्दगी को ढोया। अपने बीवी से खफा, उसे एक लड़की से मोहब्बत हो गयी। लेकिन शनीश्चर उसके पीछे ऐसा लगा हुआ था कि उसकी मौहब्बत परवान न चढ़ सकी।
हालात से उसे ऐसी नाउम्मीदी हुई कि उसने उस शहर को ही हमेशा के लिए गुडबाय कहने का हौसला किया। उसके दोस्तों ने कई बार उससे मजाक में कह दिया था कि उसकी शक्ल विनोद खन्ना से मिलती-जुलती थी। यह मजाक था या हकीकत... वह फैसला न कर सका। फिर भी उसने अपनी खोटी तकदीर को आजमाने का फैसला किया। हो सकता था कि जिन्दगी के रास्ता विहीन जंगल में कोई नयी राह सुझाई पड़ जाए...और उसे कहीं तो जाना ही था। उसने बम्बई जाने का फैसला किया। चाहे वह एक्टर न बनता। चाहे उसे ग्लैमर की दुनिया में चांस न मिलता। कोई अच्छी नौकरी तो उसे मिल ही जाती। और वैसे भी वह बहुत बढ़िया शिक्षक था। ये ही ख्याल कर वह निराशाओं के घटाघोप तिमिर में अभिलाषा की रश्मि तलाशता हुआ, उम्मीदों के विरुद्ध संघर्ष करता हुआ, अपने शहर को हमेशा के लिए गुडबाय बोल आया था और तकदीर ने उसे बम्बई महानगरी में ला पटका था। उसे क्या मालूम था कि प्रारब्ध उसके साथ एक घिनौना, अनोखा सा मज़ाक करने जा रही थी।
(प्रथम पृष्ठ)
     नमस्ते पाठक मित्रो,
जब मुझे अर्जुन राठौर जी का उपन्यास 'खेल खत्म' पढने को मिला तो मुझे यह लगा यह कोई Ghost writer हैं लेकिन यह एक वास्तविक व्यक्ति हैं लेकिन उन्होंने अर्जुन राठौर के नाम से उपन्यास लेखन किया है। अर्जुन राठौर के अन्य उपन्यास भी प्रकाशित हुये या नहीं इस विषय पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। इनका एक मात्र उपन्यास 'खेल खत्म' ही नजर आया है।
   चलो, हम प्रस्तुत के विषय में थोड़ी चर्चा कर लेते हैं। यह एक एक्शन उपन्यास और कथानक इसका बिलकुल फिल्मी है, पर रोचक है।

बेरोजगारी और पत्नी की बेवफाई से तंग सुजीत जैसे ही मुम्बई रेलवे स्टेशन पर उतरा तो एक नयी मुसीबत उसके गले आ लगी। उसके आँखों के सामने एक व्यक्ति की हत्या हो गयी और कोमल स्वभाव के सुजीत ने मानवात के नाते उस घायल व्यक्ति को अपनी बाहॊं का सहारा दे दिया
"मैं मर रहा हूं। मेरे अन्जान दोस्त! दुश्मन मेरी जान के पीछे पड़े हैं...।" वह कराहता हुआ बुदबुदाया। वह बुरी तरह हांफ रहा था। युवक की हथेलियां पीठ से बहते खून से चिपचिपा गई थीं। युवक ने देखा उसकी आंखों से जीवन ज्योति बुझती जा रही थी। चेहरा सफेद पड़ता जा रहा था।
"कौन दुश्मन? क्यों मारना चाहते हैं वे तुम्हें?" युवक जाने क्यों पूछ ही बैठा।
(पृष्ठ-09)
   मरने वाला कोई सामान्य व्यक्ति न था । वह एक नशे का कारोबारी था । एक ऐसा कारोबारी जो एकदम खरा माल बेचता था । और इसलिए टांका लगाने वाले उसके दुश्मन थे ।
 "शक्ल से वो मक्खी न मार सकने लायक आदमी लगता था। चेहरा ऐसा मासूम बना के रखता था कि क्या कोई उसके डोप पैडलर होने का शक करें। कमाठीपुरे में, चेम्बूर में, धारावी में, यहां तक कि इस बार में भी वो पेडलिंग का धंधा करता था। माल वो एकदम खरा बेचता था। इसलिए दूसरे ड्रग डीलरों का धंधा एकदम ठप्प हो गया और गोस्वामी को इस खतरे की बू आ गई। फिर तो वह कभी भूत की तरह आ धमकता और एकदम गायब हो जाता। महीनों तक न दिखाई देता। लेकिन नशेड़ियों को उसके खरे माल का चस्का लग गया था। वो गोस्वामी को ढूंढते रहते थे। और उसके मुंह तो जैसे खून लग गया... और अबकी बार वो ड्रग्स की बहुत बड़ी खेप बम्बई लाया। और इस खेप को लाने में उसका सारा नांवा-पत्ता चुक गया। जेब में उसकी फूटी कौड़ी नहीं थी। लेकिन डींगें बड़ी-बड़ी मार रहा था। कहता था एक महीने में सारा कर्जा चुका देगा। मैं पेट पकड़-पकड़कर हंसा था। लेकिन था वो बहुत बेचैन । बहुत उतावला । जैसे उसके हाथ सोने की की खान लग गई थी। पर माल के बारे में वो कुछ भी बकने को तैयार नहीं था। हर बात छुपा रहा था। डर भी वो बहुत रहा था। और जब मैंने उसको रोकड़ा देने से इन्कार कर दिया, तो वो चला गया। उसके बाद वो नहीं दिखा और बाद में तो कोई वाकई में निपटा दिया उसको। लेकिन कोई स्मैकची या ड्रग डीलर ही उसको निपटाया होगा। इतने मोटे माल के लिए किसी के भी मन में दगा आ सकता है।"
   और वह माल भी लाया, बड़ा माल लाया, पर उसे कहीं खपा न पाया और दुश्मन की गोली का शिकार हो गया और इस तरह एक दिन सरेआम ड्रग डीलर अनिल गोस्वामी की हत्या हो गयी और उसने दम तोड़ा एक ऐसे मासूम युवक की बाहों में जो शहर में नया था, पहली बार मुम्बई की धरा पर उसने पैर रखा था।
   सुजीत कुछ सोच भी नहीं पाया की वह क्या करे और क्या न करे। और उसे एक अजनबी बब्या अपनी बाईक पर बैठाकर इसलिए दूर ले गया की वह किसी चक्कर में न पड़ जाये। और वह अजनबी सुजीत को लेकर गया एक और ड्रग्स के नशेड़ी के पास। और वह था सत्या। सत्या ने नशे में अपना सब कुछ खत्म कर दिया, पत्नी की इज्जत तक भी। सत्या की पत्नी और सत्या दोनों नशे से नफरत करते हैं पर अन चाहकर भी सत्या नशा नहीं छोड़ सकता ।
पहली बार जिन्दगी में सुजीत को नशा बेचने वाले मवालियों से सख्त घृणा हुई। आज खुद उसने अपनी आंखों से इस नामुराद नशे की लत की वजह से एक शख्स को आत्महत्या करते देखा था। इंसानी जिन्दगियों को नर्क के दावानल में झुलसते देखा था।    
       बब्या (बब्लू चाको) वह सारी बात सत्या को बताता है और सुजीत की मदद की प्रार्थना करता है। बब्या हो या सत्या या फिर सत्या की पत्नी । सभी को यह तो खबर थी कि सुजीत जिस घटनाक्रम से गुजर कर आय है वह उसकी जिंदगी में तूफान लाने वाली है क्योंकि अनिल गोस्वामी मुम्बई में एक बड़ी ड्रग्स की खेप छुपा कर मरा है और हर कोई अब उस खेप के पीछे पड़ जायेगा और फिर होना खून खराबा।
   इंस्पेक्टर दीपक ताम्रकर तो सत्या के घर तक पहुँच भी गया था ।
"सत्या! ये वो ही छोकरा है ना जिसकी बांहों में गोस्वामी ने आखिरी सांस ली।"
"तो अब इस छोकरे के पीछे पड़ने का इरादा है। पन इंस्पेक्टर इसको कुछ नेई पता ।"
"कैसे नेई पत्ता ! लोगों का कहना है कि गोस्वामी ने मरने से पहले इसको कुछ बका जरूर था। सत्या! तू बीच में मत आना। मैं उगलवाऊंगा इससे सब कुछ। साला कैसे नहीं फूटेगा। पुलिस की मार के आगे मुर्दे भी तोते की तरह बोलते हैं।" ताम्रकर जहरीले स्वर में बोला ।
"पन इंस्पेक्टर, तू इसके पीछे क्यों पड़ा हुआ है? तू धारावी इलाके में इंस्पेक्टर है, जबकि खून तो अंधेरी स्टेशन से थोड़ी दूर हुआ था। वो तो तेरा इलाका नेई।"
"वो मेरा इलाका नहीं है। फिर भी मेरे को गोस्वामी क्या बका, ये मालूम करना है।"
"ओह! अब समझा। साले हलकट पुलिसिये ! अपुन तेरी जात को अच्छी तरह समझता है। साले! तेरे को गोस्वामी में नेई, उस माल में दिलचस्पी है। जो गोस्वामी कहीं छिपाया। साले क्या करेगा उस माल का! खुद बेचेगा और रोकड़ा हासिल करेगा।" सत्या मखौल उड़ाने वाले अंदाज में बोला।
"साले नशेड़िये ! तेरी तो मैं...।" ताम्रकर ने झपटकर सत्या का गिरेहबान थाम लिया।

   सत्या के पास अब एक ही रास्ता बचा था और वह था पहलवान का रेस्टोरेंट । पहलवान के रेस्टोरेंट में सुजीत को सुरक्षा और नौकरी दोनों ही मिल गये थे। पहलवान की पहचान और पहुंच के कारण सुजीत यहाँ सुरक्षित था। पर कब तक ?
एक दिन इंस्पेक्टर दीपक ताम्रकर पहलवान के रेस्टोरेंट भी पहुंच गया ।
"इंस्पेक्टर ताम्रकर होता हूं मैं। अगर तेरे को या तेरे इस छोकरे को सलाखों के पीछे न पहुंचाया तो अपने बाप की औलाद नहीं मैं। वदीं की कसम । तुम दोनों को तो फंसाकर रहूंगा। नाऊ यू शुड वाव योर एवरी स्टेप केयरफुली अदरवाइज आई विल गेट यू डन ।"-गुस्से से कांपता हुआ इंस्पेक्टर बोला ।
     इंस्पेक्टर जानता था अनिल गोस्वामी का माल करोड़ों था और जिसके भी हाथ लगेगा वह करोड़पति कहलायेगा और इसके लिए इंस्पेक्टर सिर्फ अपना क्षेत्र ही नहीं अपना मान- सम्मान सब कुछ छोड़कर ड्रग्स के पीछे पड़ा था और वह ड्रग्स अनिल गोस्वामी कहां छोड़कर गया यह किसी को भी नहीं पता और ना यह खबर थी कि अनिल गोस्वामी को मारा किसने । इंस्पेक्टर के सामने तो बस एक सुजीत था और उसे उम्मीद थी मरते वक्त शायद अनिल गोस्वामी को कुछ बताकर मरा हो।
और वहीं सुजीत.....मैं गोस्वामी के हत्यारे को ढूंढना जरूर चाहता हूं। एक अनजान शख्स जिसने मेरी बांहों में दम तोड़ा और मुझे वो अपना दोस्त कबूल कर गया, मेरे मन को कचोट रहा है। वो कैसा भी था। ड्रग डीलर, क्रिमनल, स्मैकची । लेकिन था फिर भी वो इंसान। और एक इंसान की मौत का मुझे सख्त अफसोस है और मुझे हर वक्त उस हत्यारे की तलाश रहेगी।"(पृष्ठ-60)
    कार्लो एडम्स अपने मौजूदा हालात से सख्त नाखुश था ।कभी वो वालीवुड का बहुत बड़ा पाॅप सिंगर था । (पृष्ठ- 22)....... और हताशा का मारा हुआ, अवसाद से ग्रस्त कार्लो ड्रग एडिक्ट्स की सोहबत में स्मैकची बन गया । स्मैक उसके गमों को भुलाने के लिए सहारा बन गयी । (पृष्ठ-23)
  कार्लो की स्टार बीवी ने भी जब उसे कुत्ते की तरह दुत्कार दिया तो वह अपने जैसे और साथियों से जा मिला ।
वो दो आदमी थे। लम्बा, पतला, कन्धों तक लम्बे बालों वाला शख्स जुल्फीकार अली था। उसके सफेद, कंकाल जैसे चेहरे में दो छोटी-छोटी शीशों की तरह बेजान-सी आंखें धंसी हुई-सी मालूम होती थीं। उसका मोटा, उम्र में दस साल बड़ा साथी शैतानमल के नाम से जाना जाता था।
दोनों ही पक्के स्मैकिये थे।
और कमाठीपुरे के उस बार में कार्लो एडम्स के साथ बैठे दारू पी रहे थे। (
पृष्ठ- 43)
   अनिल गोस्वामी के माल की बात कहीं छुपी हुयी नहीं थी।
क्योंकि माल लाने से पहले गोस्वामी कई लोगों के सामने बड़क मार चुका था। इसलिए अण्डरवर्ल्ड में ये चर्चा किस्से कहानियों की तरह प्रचलित हो गयी थी कि गोस्वामी इस बार मोटा माल लाया था। (पृष्ठ- 97)
   पुलिस, अण्डरवर्ल्ड के अतिरिक्त हर वह व्यक्ति जो अनिल गोस्वामी के माल का आदी, उसका परिचित था वह भी अनिल गोस्वामी की छुपाई 'खेप' को प्राप्त करना चाहता था ।
ऐसे ही तीन शख्स थे कार्लो, जुल्फिकार और शैतानमल जिन्हें कुछ- कुछ खबर थी सुजीत की और माल की । और अप्रत्यक्ष रूप से और भी क ई पार्टियाँ उस माल को हथियाना चाहती थी और सभी को नजर आता था एक मात्र सुजीत ‌। और सुजीत पहलवान की खूबसूरत लड़की पर फिदा था ।
खूब लम्बा कद। दूधिया रंग । खूब भरी- भरी देह । समुद्र के पानी जैसी गहरी नीली जंगली बिल्ली जैसी आँखें। सुर्ख कपोल, रसीले अधर । भूरे- भूरे कैस जैसे भूरे बादलों ना लहराता आंचल हो । वाकई में वह दिलफरेब हसीना थी । (पृष्ठ- 34) ऐसी थी पहलवान की रीटा ।
घात- प्रतिघात के इस खेल में चाहे पुलिस वाले एक कदम आगे थे। पर डर तो उन्हें भी था कि कहीं 'बड़ा माल' किसी और के हाथ न लग जाये ।
उसके दिल में धुकधुकी लगी हुई थी। आखिर कौन हो सकते थे वो मवाली जो उससे एक कदम आगे थे। अगर माल के पीछे कई लोग लगे हुए थे तो माल हड़पने मैं दिक्कतें आ सकती थीं। देख लूंगा सालों को ! आखिर वो मवाली थे! और वह तो पुलिस वाला था। उससे पंगा लेना क्या कोई हंसी-खेल था ।
सोचों में गुम उसने अपनी रायल एनफिल्ड स्टार्ट की।
(पृष्ठ- 101)
    तो यह कहानी है एक शख्स अनिल गोस्वामी के ड्रग्स के माल की। और अब हर कोई उसे हथियाना चाहता है। वहीं कथा नायक युवा सुजीत हर किसी के लिए फुटबाल बन चुका है‌ । उसने प्रण तो लिया था कि वह अनिल गोस्वामी के हत्यारे को खोज निकालेगा पर यहां उसकी स्वयं जान की जान खतरे में है । क्या पुलिस, क्या मवाली और क्या छद्म दुश्मन हर कोई सुजीत की ताक में ही बैठा है।
   अब देखना यह है की सुजीत पहले हत्यारे तक पहुंचता है या हत्यारा सुजीत तक ‌ । पहले माल तक हत्यारा पहुंचता है या पुलिस, सुजीत या अन्य कोई । यहां हर कॊई एक दूसरे पर घात लगाये बैठा है जैसे ही मौका मिलता है वार कर बैठता है। दोस्तों- दुश्मनों से घिरा सुजीत उतना ही अकेला है जितना वह मुम्बई रेल्वे स्टेशन पर उतरते वक्त था । फर्क बस इतना है तब यहां उसका कोई दोस्त या दुश्मन नहीं था अब हर कॊई दुश्मन है।
   अब देखना यह है कि इस घात- प्रतिघात में किसका खेल खत्म होता है।

भाषा पक्ष
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में भाषा पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता । उपन्यासों की भाषा सरल और सहज होती है और अधिकांश लेखकों की भाषा एक जैसी ही होती है।
पहली बार किसी ने लेखक भाषा को थोड़ा साहित्यिक बनाने का प्रयास किया है और यह प्रयास ज्यादातर प्राकृतिक चित्रण में ही नजर आया है।
प्रकृति का मौन संगीत जैसे आमन्त्रण देता प्रतीत हो रहा था। लहरों की अठखेलियां, नारियल के वृक्षों का नृत्य और भीगी हवा की सौंधी-सौंधी खुशबू ने सुजीत के मन को आहलादित कर दिया। प्रकृति में बसी आत्मा की दिव्य शक्ति ने सुजीत को आकृष्ट कर लिया था। और वह सारा गम, अवसाद, व्यग्रता और भय भूल चुका था।
संवाद-
मालदार पुलिसिया कटखने कुत्ते से बद्तर होता है।
उपन्यास की कहानी नशेड़ी लोगों की कहानी है ।‌ उपन्यास के अधिकांश पात्र नशा करते हैं या नशे से संबंधित हैं। लेखक महोदय ने नशे की या नशेड़ी की प्रशंसा नहीं की बल्कि नशे को गलत ही हठराया है।
सत्या और उसकी पत्नी दोनों नशे को बुरा बताते हैं। फिल्मकार का घर नशे ने उजाड़ दिया ।
ड्रग्स का नशा ऐसी ही मतिभ्रष्ट करने वाला होता है।
स्मैकची बड़ा से बड़ा गुनाह कर सकता है। वह स्मैक की एक पुड़िया के पीछे कत्ल कर सकता है। और स्मैक की एक पुड़िया के नशे में विवेकशून्य होकर कुछ भी कर गुजर सकता है।
ऐसा ही होता है ड्रग्स का नशा ।(पृष्ठ- 121)

उपन्यास की कहानी अच्छी है पर कुछ जगह उपन्यास कमजोर नजर आता है।
- अनिल गोस्वामी के माल को हड़पने वाले लोग सुजीत के पीछे इसलिए पड़े नजर आते हैं कि अनिल गोस्वामी ने सुजीत की बांहों में दम तोड़ा ‌। यह ज्यादा तार्किक तथ्य नहीं ।
- उपन्यास में सुजीत कई बार मन में दोहराता है कि वह अनिल गोस्वामी के अंतिम शब्द किसी को नहीं बतायेगा। पर वह उपन्यास के आरम्भ में ही सत्या को वह शब्द बता देता है। (शायद लेखक महोदय इस बात को भूल गये)
- कार्लो एडम्स और उसकी पत्नी की कहानी लगता था उपन्यास में समांतर कथा चलेगी पर लेखक ने कुछ घटनाओं के पश्चात वह कहानी समाप्त ही कर दी ।
 

कुछ और तथ्य- अनिल गोस्वामी उपन्यास के आरम्भ में ही मर जाता है पर उसकी उपस्थिति उपन्यास के अंत तक बनी रहती है।

- सुजीत का जिस तरह से चरित्र तैयार किया गया है। उसका वर्णन यहा है उस दृष्टि से लगता है सुजीत को लेकर और उपन्यास भी लेखन का विचार रहा होगा पर अर्जुन राठौर के और उपन्यास कभी नजर नहीं आये ।

'अर्जुन राठौड जी का प्रस्तुत उपन्यास 'खेल खत्म' एक मनोरंजक उपन्यास है । यह एक थ्रिलर कहानी होने के साथ- साथ नशेड़ी लोगों की जिंदगी का यथार्थ चित्रण करती है । उपन्यास एक्शन और रोमांच से भरपूर है।

उपन्यास-   खेल खत्म
लेखक-     अर्जुन राठौर
प्रकाशक-  शिवा पॉकेट बुक्स
पृष्ठ-         222

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